(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.170. अध्यायः 170
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
वने चरतां पाण्डवानां व्यासेन सान्त्वनं एकचक्रानगर्यां ब्राह्मणगृहे स्थापनं च॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

`वैशम्पायन उवाच। 1-170-0x(995)(7742)
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे शालिहोत्राश्रमे तदा।
पूजितास्तेन वन्येन तमामन्त्र्य महामुनिम्॥ 1-170-1(7743)
जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः।
कुन्त्या सह महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपुः॥ 1-170-2(7744)
ब्राह्मं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः।
नीतिशास्त्रं च धर्मज्ञा न्यायज्ञानं च पाण्डवाः॥ 1-170-3(7745)
शालिहोत्रप्रसादेन लब्ध्वा प्रीतिमवाप्य च।'
ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान्बहून्।
अपक्रम्य ययू राजंस्त्वरमाणा महारथाः॥ 1-170-4(7746)
मत्स्यांस्त्रिगर्तान्पाञ्चालान्कीचकानन्तरेण च।
रमणीयान्वनोद्देशान्प्रेक्षमाणाः सरांसि च॥ 1-170-5(7747)
क्वचिद्वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः।
`क्वचिच्छ्रान्ताश्च कान्तारे क्वचित्तिष्ठन्ति हर्षिताः'॥ 1-170-6(7748)
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः।
पथि द्वैपायन सर्वे ददृशुः स्वपितामहम्॥ 1-170-7(7749)
तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा।
तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परन्तपाः॥ 1-170-8(7750)
व्यास उवाच। 1-170-9x(996)
तदाश्रमान्निर्गमनं मया ज्ञातं नरर्षभाः।
घटोत्कचस्य चोत्पत्तिं ज्ञात्वा प्रीतिरवर्धत॥ 1-170-9(7751)
इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम्।
वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः॥ 1-170-10(7752)
वैशम्पायन उवाच। 1-170-11x(997)
एवं स तान्समाश्वास्य व्यासः पार्तानरिन्दमान्।
एकचक्रामभिगतां कुन्तीमाश्वासयत्प्रभुः॥ 1-170-11(7753)
श्रीव्यास उवाच। 1-170-12x(998)
कुर्यान्न केवलं धर्मं दुष्कृतं च तथान नरः।
सुकृतं दुष्कृतं लोके न कर्ता नास्ति कश्चन॥ 1-170-12(7754)
अवश्यं लभते कर्ता फलं वै पुण्यपापयोः।
दुष्कृतस्य फलेनैव प्राप्तं व्यसनमुत्तमम्॥ 1-170-13(7755)
तस्मान्माधवि मानार्हे मा च शोके मनः कृथाः। 1-170-14(7756)
वैशम्पायन उवाच।
एवमुक्त्वा निवेश्यैनान्ब्राह्मणस्य निवेशने॥ 1-170-14x(999)
जगाम भगवान्व्यासो यताकाममृषिः प्रभुः॥ ॥ 1-170-15(7757)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 170 ॥ ॥ समाप्तं हिडिम्बवधपर्व ॥


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